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श्रीमद्भागवत में वर्णित खगोल विज्ञान का वैज्ञानिक अध्ययन
डॉ. कीर्ति कुमार त्रिपाठी, केशवेन्द्र कुमार द्विवेदी
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सारांश:
श्रीमद्भागवत् में खगोल विज्ञान का वर्णन केवल धार्मिक प्रतीकवाद नहीं है; इसमें तारकीय विज्ञान, ग्रहों की गति, सृष्टि और प्रलय के चक्र, तथा ब्रह्मांडीय संरचना जैसे विषयों पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण शामिल है। आधुनिक शोध इसे प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान का आधार है। आज तारों और नक्षत्रों के आकार में व्यवस्थित बताया गया है। यह आकाशीय तारकीय विज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है। ग्रहों की गति सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रहों की गतियों तथा कक्षाओं का वर्णन मिलता है, जो आधुनिक खगोल विज्ञान से संबंधित हैं। सृष्टि और प्रलय ब्रह्मांडीय चक्रों का उल्लेख किया गया है, जिसमें कल्प, मन्वंतर और प्रलय के समय-मान शामिल हैं। काल चक्र समय की गणना युगों के चक्रों और तारों की गतियों के माध्यम से की गई है। विज्ञान और खगोल विज्ञान के विकास के साथ-साथ ग्रहों और तारों के प्रभाव को दर्शाया गया है। उसी प्रकार भारतीय दर्शन में योग का विषय अनंत और असीम है। सभी आचार्यों ने इसकी अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं। योग जैसे गहन और कठिन विषय में प्राचीन आचार्यों के बीच अनेक विभिन्न मत होना स्वाभाविक है। कोई विषय जो सूक्ष्म और जटिल होने के कारण अनेक दृष्टिकोणों से परखा जाता है, वह एक प्रकार से उसकी महत्ता का भी संकेत है। “योग” शब्द संदर्भ के अनुसार अनेक अर्थों में पाया जाता है।1 इसलिए इसे किसी सीमित या सांकेतिक अर्थ में बाँधना उचित नहीं है। कुछ लोग योग का अर्थ समाधि मानते हैं, जबकि अन्य के अनुसार योग का अर्थ अष्टांग योग के माध्यम से चित्त की वृत्तियों का निरोध है। कुछ लोग योग का अर्थ सहयोग लेते हैं, जबकि कुछ के अनुसार “योग” शब्द दो अवस्थाओं के मिलन या जुड़ने का संकेत करता है। श्रीमद्भागवतम् में वर्णित खगोल विज्ञान आधुनिक खगोल विज्ञान के कई सिद्धांतों के अनुरूप है। यह तारकीय विज्ञान, ग्रहों की गति, अंतरिक्ष संरचना और पुनर्जन्म से संबंधित ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान मिशन के शोधकर्ता भी प्राचीन ग्रंथों में वर्णित खगोलीय घटनाओं की आधुनिक उपकरणों के साथ तुलना कर रहे हैं यहाँ तक सौर की गतिविधियाँ तक सामिल हैं। गहन विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि योग की व्याख्या “त्याग” के रूप में करना उचित है। चाहे वह किसी इच्छित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संयोग द्वारा हो या स्वतंत्र रूप से, योग का अर्थ “त्याग” के रूप में तार्किक और उद्देश्यपूर्ण है। सामान्य व्यवहार में भी योग का अर्थ त्याग के रूप में देखा जाता है। उदाहरण के लिए, लोग कहते हैं, “फलाँ व्यक्ति योगी बन गया है,” या “फलाँ व्यक्ति ने संसार का पूर्ण रूप से त्याग कर दिया प्रतीत होता है।” संन्यास योग, सांख्य योग, निष्काम कर्म योग आदि शब्दों से यह सिद्ध होता है कि अंततः योग शब्द केवल त्याग को ही दर्शाता है। क्योंकि एक वस्तु के त्याग के बिना दूसरी वस्तु के साथ संयोग संभव नहीं हो सकता।
मुख्य शब्द: सृष्टि, प्रलय, चक्र, ब्रह्मांडीय, वैज्ञानिक, नक्षत्रों, सूर्य आदि।
How to Cite:
[1] डॉ. कीर्ति कुमार त्रिपाठी, केशवेन्द्र कुमार द्विवेदी, “श्रीमद्भागवत में वर्णित खगोल विज्ञान का वैज्ञानिक अध्ययन,” International Advanced Research Journal in Science, Engineering and Technology (IARJSET), DOI: 10.17148/IARJSET.2026.13733
